Zila Panchayat Morena Jila Ki Jankari | इतिहास, संस्कृति

Zila Panchayat Morena Jila Ki Jankari | इतिहास, संस्कृति

चंबल नदी के किनारे बसा Morena Jila का मुख्यालय मुरैना तहसील में स्थित है। मोरों की बहुतायत वाले मुरैना जिला जिले का कुल क्षेत्रफल 4991 वर्ग किलोमीटर है। वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर यहां की जनसंख्या 1091854 है। Morena Jila की विकास दर 0.1401 दर्ज की गई है।

इस जिले में प्रति हजार व्यक्तियों के पीछे (लिंगानुपात) 840 महिलाएं आती है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार ही जिले की साक्षरता 75.69% दर्ज की गई है। मुरैना जिले का गठन के अंतर्गत मुरैना, अंबाह, पोरसा, जौरा, सबलगढ़ तथा कैलारस आदि तहसीलों को सम्मिलित किया गया है। इस जिले में मोरों की संख्या अधिक होने की वजह से इसका नाम मुरैना पड़ा।

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Morena Jila ki Jankari
Morena Jila

Morena Jila भौगोलिक स्थिति

मुरैना जिला 26.5 N0  से 78.0 E0 में स्थित है। जिले की उत्तरी सीमा का निर्माण चंबल नदी करती है। उत्तर तथा पूर्व क्षेत्र गंगा-यमुना द्वारा निर्मित दोआब के उपजाऊ मैदान  से घिरा हुआ है। जिले का पश्चिम क्षेत्र राजस्थान के अर्द्ध शुष्क भू-भाग से जुड़ा हुआ है। मुरैना शहर का नाम जिले से 8 किलोमीटर दूर स्थित छोटे से मुरैना गांव के नाम पर पड़ा है।

वर्तमान शहर से दूर स्थित शिकारपुर के पास रेलवे स्टेशन तथा सराय को भी बाद में पुराने गांव के नाम से ही बदल दिया गया था। प्रारंभ में इस जगह पर कई कपास प्रसंस्करण मशीनें होने के कारण इसे पेंच-मुरैना के नाम से भी पहचाना जाता था। यह जिला राज्य की उत्तर पश्चिमी सीमा पर चंबल घाटी में स्थित है।

Morena Jila का इतिहास

19 वीं सदी के सकरवारी तथा तंवरगढ़ जिलों के संयुक्त रूप को वर्तमान मुरैना जिला कहते हैं। सिकरवार राजपूतों की बड़ी बसावट होने के कारण जिले के अंबाह क्षेत्र को सिकरवारी के नाम से भी जाना जाता था। जिले के मध्य में स्थित जौरा क्षेत्र में तंवरों (तोमरों) की बसावट के कारण मध्य भाग सिमिलेरी को तमरगढ़ के नाम से भी जाना जाता था।

अनुश्रुतियों के अनुसार मुरैना, नूराबाद, छोड़ा, पोरसा आदि स्थानों पर मुगल काल के दौरान राजमार्ग पर सरई (आश्रय) हुआ करते थे। वर्ष 1904 के बाद जिला सिकरवारी तथा पूर्व ग्‍वालियर के हिस्से को जौरा-अलापुर मुख्यालय के साथ तवरघार में विलय किया गया था, जिसे वर्तमान में एक तहसील मुख्यालय के नाम से जाना जाता है।

जिले के अंतर्गत आने वाले कुतवार गांव में वर्ष 1927-28 के दौरान की गई खुदाई में 18,659 कांस्य सिक्कों का विशाल खजाना क्षेत्र में तीसरी तथा चौथी शताब्दी के दौरान नागा राजाओं के शासन को इंगित करता है। इस क्षेत्र में नागाओं के अलावा गुप्त, हूंण, वर्धन, गुर्जर, प्रतिहार, चंदेल तथा कछवाह आदि शासकों द्वारा बड़ी कुशलता से शासन किया गया था।

कछवाहा वंश के प्रसिद्ध राजा कीर्तिराज ने जिले के अंतर्गत आने वाले सिहोनिया के मंदिरों का निर्माण कराया गया था। 18 वीं शताब्दी के आखरी दशक  में अकबर ने क्षेत्र पर आक्रमण कर मुगल शासन स्थापित किया था।

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Morena Jila Ka Gathan | मुरैना जिला का गठन

पूर्व ग्वालियर राज्य के श्योपुर जिले को वर्ष 1948 में मध्य भारत के गठन के परिणाम स्वरूप मध्य भारत का हिस्सा बना दिया गया था। मध्य प्रदेश राज्य के पुनर्गठन के पश्चात जिले को एक नवीन जिले के रूप में घोषित किया गया। श्योपुर जिले का निर्माण 22 मई 1998 को श्योपुर, कराहल तथा विजयपुर तहसीलों को शामिल करते हुए किया गया। मुरैना जिले का गठन जिले को दो भागों में बांट कर किया गया था।

मुरैना जिले का गठन के परिणाम स्वरूप शेष मुरैना जिले में मुरैना, पोरसा, अंबाह, जौरा-कैलारस तथा सबलगढ़ तहसील ही शेष बची थीं। महादजी सिंधिया द्वारा वर्ष 1761 में पानीपत की लड़ाई के दौरान ग्वालियर पर कब्जा किया गया। इसके साथ ही उनके द्वारा मुरैना को भी ग्वालियर का हिस्सा बना लिया गया थी।

वर्ष 1810 में महादजी सिंधिया के बाद दौलतराव सिंधिया ने ग्वालियर को अपनी राजधानी घोषित की थी। जयजी राव सिंधिया ने (वर्ष 1843-86) के बीच अपने शासनकाल के दौरान मुरैना क्षेत्र को 4 जिलों में विभाजित किया गया। इसके अंतर्गत सबलगढ़, श्योपुर,, सिकरवारी तथा तंवरघर जिले शामिल थे।

वर्ष 1857 के विद्रोह के दौरान जीवाजी राव सिंधिया ने ब्रिटिश शासन से हाथ मिला लिया था। परंतु इसके विपरीत ग्वालियर के सिपाहियों ने झांसी की रानी लक्ष्‍मीबाई के भयंकर विद्रोह के बारे में सुन 14 जून 1857 में विद्रोह का हिस्सा बनना स्‍वीकर किया गया। जून 1858 में रानी लक्ष्मीबाई, राव साहब तथा तात्या टोपे की संयुक्त सेना ने ग्वालियर पर आक्रमण कर ग्वालियर पर कब्जा किया गया था।

परिणाम स्वरूप महाराजा तथा उनके दीवान दिनकर राव आगरा निकल भागे। बाद में उनके द्वारा अंग्रेजों के साथ मिलकर विद्रोही संयुक्‍त सेना को हराकर ग्वालियर पर दोबारा कब्जा कर लिया गया। इस युद्ध के दौरान झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को वीरगति प्राप्त हुई थी।

देश के आजाद होने पर 15 अगस्त 1947 को ग्वालियर राज्य को भारत के संघ में शामिल किया गया। 28 मई 1948 को राज्यों के पुनर्गठन के दौरान मध्य भारत को एक एकीकृत राज्य में शामिल किया गया। 1 नवंबर 1956 को नए मध्य प्रदेश राज्य के गठन के बाद राज्यों के पुनर्गठन के दौरान मुरैना जिले का गठन एक अलग नया जिला घोषित करते हुए किया गया।

Morena के अंतर्गत होने वाले निर्वाचन

मुरैना जिला की जानकारी के तहत मुरैना जिला संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आता है। इस संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत मुरैना तथा श्योपुर जिले को शामिल किया गया है। जिले का प्रभारी कलेक्टर तथा जिला निर्वाचन अधिकारी जिले में होने वाले सभी प्रकार के चुनावों हेतु नियंत्रक अधिकारी के रूप में कार्यरत होते हैं।

मुरैना संसदीय क्षेत्र को 7 विकासखंण्‍डों में बांटा गया है। संसदीय क्षेत्र के अनुसार विकासखण्‍ड वार जनसंख्‍या का विवरण निम्‍नानुसार है:-

श्योपुर विकासखंड की स्थिति

श्‍यापुर विकासखंड में जनगणना 2011 के आंकड़ों के अनुसार कुल जनसंख्‍या 228700 आंकी गई है। जिसमें 119872 पुरूष तथा 108827 महिलाएं एवं 01 अन्‍य शामिल है। इस क्षेत्र में महिला : पुरूष अनुपात के अनुसार महिलाओं की संख्‍या 908 (प्रति हजार व्‍यक्ति) दर्ज की गई है।

विजयपुर विकासखंड

विजयपुर विकासखंड में जनगणना 2011 के आंकड़ों के अनुसार कुल जनसंख्‍या 223658 आंकी गई है। जिसमें 119134 पुरूष तथा 104524 महिलाएं एवं 0 अन्‍य शामिल है। इस क्षेत्र में महिला : पुरूष अनुपात के अनुसार महिलाओं की संख्‍या 877 (प्रति हजार व्‍यक्ति) दर्ज की गई है।

सबलगढ़ विकासखंड

सबलगढ़ विकासखंड में जनगणना 2011 के आंकड़ों के अनुसार कुल जनसंख्‍या 212685 आंकी गई है। जिसमें 114444 पुरूष तथा 98236 महिलाएं एवं 05 अन्‍य शामिल है। इस क्षेत्र में महिला : पुरूष अनुपात के अनुसार महिलाओं की संख्‍या 858 (प्रति हजार व्‍यक्ति) दर्ज की गई है।

जौरा विकासखंड

जौरा विकासखंड में जनगणना 2011 के आंकड़ों के अनुसार कुल जनसंख्‍या 240866 आंकी गई है। जिसमें 131034 पुरूष तथा 109803 महिलाएं एवं 29 अन्‍य शामिल है। इस क्षेत्र में महिला : पुरूष अनुपात के अनुसार महिलाओं की संख्‍या 838 (प्रति हजार व्‍यक्ति) दर्ज की गई है।

सुमावली विकासखंड

सुमावली विकासखंड में जनगणना 2011 के आंकड़ों के अनुसार कुल जनसंख्‍या 234962 आंकी गई है। जिसमें 129697 पुरूष तथा 105253 महिलाएं एवं 12 अन्‍य शामिल है। इस क्षेत्र में महिला : पुरूष अनुपात के अनुसार महिलाओं की संख्‍या 812 (प्रति हजार व्‍यक्ति) दर्ज की गई है।

मुरैना विकासखंड

मुरैना विकासखंड में जनगणना 2011 के आंकड़ों के अनुसार कुल जनसंख्‍या 250298 आंकी गई है। जिसमें 138279 पुरूष तथा 112005 महिलाएं एवं 14 अन्‍य शामिल है। इस क्षेत्र में महिला : पुरूष अनुपात के अनुसार महिलाओं की संख्‍या 810 (प्रति हजार व्‍यक्ति) दर्ज की गई है।

दिमनी विकासखंड

दिमनी विकासखंड में जनगणना 2011 के आंकड़ों के अनुसार कुल जनसंख्‍या 211151 आंकी गई है। जिसमें 115857 पुरूष तथा 95288 महिलाएं एवं 06 अन्‍य शामिल है। इस क्षेत्र में महिला : पुरूष अनुपात के अनुसार महिलाओं की संख्‍या 822 (प्रति हजार व्‍यक्ति) दर्ज की गई है।

मुरैना लोकसभा क्षेत्र

मुरैना लोकसभा क्षेत्र में जनगणना 2011 के आंकड़ों के अनुसार कुल जनसंख्‍या 1820748 आंकी गई है। जिसमें 986161 पुरूष तथा 834513 महिलाएं एवं 74 अन्‍य शामिल है। इस क्षेत्र में महिला : पुरूष अनुपात के अनुसार महिलाओं की संख्‍या 822 (प्रति हजार व्‍यक्ति) दर्ज की गई है।

Zila Panchayat Morena के प्रसिद्ध व्यंजन

Gajak | गजक

जिले में बनाई जाने वाला मिष्‍ठान जिसे मुरैनाकी प्रसिद्धगजक के नाम से जाना जाता है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपने नाम से पहचानी जाती है। इसका निर्माण तिल तथा गुण से किया जाता है। लगभग 5 से 8 किलो गजक का निर्माण करने के लिए कम से कम 10 से 15 घंटे लगते हैं। इस मिठाई का अपना ही स्‍वाद है।

मुरैना की बेड़ई

जिले में स्नेक्स के रूप में खाया जाने वाला मुरैना की बेड़ई मनपसंद व्यंजन है। इसे बेड़ई के नाम से पहचाना जाता है। इस व्‍यंजन को लगभग सभी अवसरों पर परोसा जाता है। यह बहुत ही स्वादिष्ट एवं चटपटा होता है।

मुरैना जिला के मालपुए

मिष्ठान के रूप में यहां पर बनाई जाने वाली आटे तथा गुड से निर्मित मालपुए काफी प्रसिद्ध है। जिसे लोग बड़े चाव से खाते हैं। जिले में मालपुओं ने भी अपनी विशेष पहचान बनाई है।

नागाजी का मेला Zila Panchayat Morena

जिले का सबसे प्रसिद्ध नागाजी का मेला नवंबर से दिसंबर महीने के दौरान संत नागा जी के याद में आयोजित किया जाता है। संत नागाजी अकबर के शासन काल में निवासरत थे। इस मेले में शुरुआती दौर में बंदरों को बेचा जाता था। बाद में नागाजी के मेला में अन्य घरेलू जानवरों का भी क्रय विक्रय किया जाने लगा। इस मेले का आयोजन एक माह तक किया जाता है।

Zila Panchayat Morena की संस्कृति और विरासत

मुरैना जिला मुख्य रूप से अपनी अद्भुत वास्तुकला के लिए पहचाना जाना चाहिए। यह जिला हिंदू मंदिर वास्तुकला का एक प्रमुख केंद्र हुआ करता था। मुरैना जिला के अंतर्गत पुरातनता के 9 महान स्मारकों में से गुर्जर, प्रतिहारों, कछवाहा आदि राजवंशों द्वारा निर्मित पांच बिल्कुल विशाल स्मारक मौजूद हैं।

जिला मुरैना का दक्षिणी हिस्सा वन, नदी, घाटियों, पहाड़ियों तथा झाड़ियों आदि विविधताओं से परिपूर्ण है। इन विविधताओं के कारण इस क्षेत्र में शासन करना अथवा आक्रमण करना दोनों ही बहुत कठिन रहा है।

7वी से 12वीं शताब्दी के दौरान गुर्जर-प्रतिहार राजवंशों के शासन में होने से क्षेत्र में यह समय मंदिर निर्माण हेतु स्वर्णिम काल रहा। इसी समय में जिले के अंतर्गत अधिकांश महानतम स्मारकों का निर्माण किया गया था। इस काल में कन्नौज के यशोवर्मन द्वारा मंदिरों का नरसर समूह, कन्नौज में निर्मित कराया गया था।

इस दौरान गुर्जर-प्रतिहारों द्वारा मंदिरों के बटेश्वर समूह का निर्माण कराया गया था। कछवाहा वंश द्वारा इस दौरान सिहोनिया में ककनमठ मंदिर, मितावली में चौसठ योगिनी मंदिर तथा ग्वालियर में पदावली शिव मंदिर का निर्माण कराया गया था। 20वीं सदी में जिला डकैतों के लिए प्रसिद्ध हुआ

20वीं शताब्दी के दौरान मुरैना के नाले छापामार गतिविधियों के लिए आदर्श होने के कारण डकैतों के लिए शरण स्‍थली के रूप में उभर कर सामने आए। इससे यह जिला डकैतों के आतंक से भी काफी प्रसिद्ध हुआ।

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Morena Jila में प्रसिद्ध राष्‍ट्रीय धरोहर

Morena Jila पुरातत्विक महत्‍व की दृष्टि से काफी समृद्ध है। इतिहास पर गौर करने पर हम पाते हैं, कि इस शहर व आसपास के क्षेत्रों में कई राजवंशों द्वारा शासन किया गया है। विभिन्‍न राजवंशों द्वारा अपनी कला व शैली के अनुसार मंदिर, महल आदि खूबसूरत इमारतों का निर्माण किया गया है। इन्‍हीं में से पुरातत्विक महत्‍व की संरक्षण प्राप्‍त कुछ एतिहासिक धरोवर निम्‍नानुसार हैं:-

Sihoniya | सिहोनिया

मुरैना सिंहोनिया में ककडमठ मंदिर Sihoniya | सिहोनिया
सिंहोनिया में ककडमठ मंदिर

Morena Jila के अंतर्गत आने वाला एक कस्बा सिहोनिया काफी प्रसिद्ध है। इसे मध्यकाल में सिहापनिआ के नाम से जाना जाता था। इसे यदा-कदा सुहानीया के नाम से भी संबोधित किया जाता रहा है। इसी स्थान पर राष्ट्रीय महत्व का प्रसिद्ध उल्लेखनीय स्मारक स्थित हैं, जिसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित किया गया है। यहां सुहानिया में सास-बहू अभिलेख पाए गए हैं।

यहां का सबसे प्रसिद्ध स्मारक यहां निर्मित पुराना ककनमठ शिव मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में बड़े पैमाने पर करवाया गया था। यह मंदिर कछवाहा वंश द्वारा निर्मित एकमात्र जीवित सही मंदिरों में से एक है।

शहर का सबसे महत्वपूर्ण मंदिर अंबिका देवी का मंदिर है, जो अंबिका देवी को समर्पित है। इस परिसर में दो मंदिरों का निर्माण एक साथ कराया गया है, जिसे चारों तरफ से एक दीवार से घेरा गया है। सिहोनिया के तुरंत दक्षिण में एक प्रमुख जैन मंदिर तथा परिसर है। इस क्षेत्र से जैन पत्थरों के चित्र एकत्रित तथा संग्रहित किए गए हैं।

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Chausath Yogini ka Mandir | चौसठ योगिनी का मंदिर

Chausath Yogini ka Mandir जिला का चौसठ योगिनी का मंदिर
Chausath Yogini ka Mandir

यह पुरातन महत्व का स्थल ग्वालियर से 40 किलोमीटर दूर Morena Jila के बरौली के पास स्थित मितौली, मिताली या मितावली गांव में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण कछवाहा राजा देवपाल द्वारा करवाया गया था। मंदिर में सूर्य के गोचर के आधार पर ज्योतिष तथा गणित में शिक्षा प्रदान करने का स्थान मौजूद है।

चौसठ योगिनी का मंदिर को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा प्राचीन और ऐतिहासिक संरक्षित स्मारक के रूप में घोषित किया गया है। इस मंदिर को एक कट्टा शो महादेव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर 100 फीट ऊंची एक अलग पहाड़ी पर गोलाकार बनाया गया है।

इस मंदिर के ऊपर से खेतों में की गई खेती का शानदार दृश्य दिखाई देते है। मंदिर में मौजूद कोशिकाओं के अंदर भारी मात्रा में शिवलिंग के मौजूद होने के आधार पर ही इसका नामकरण कट्टा शो महादेव मंदिर के रूप में किया गया है।

इस मंदिर के चौसठ योगिनी को समर्पित होने के कारण इसे चौसठ योगिनी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर को गोलाकार बनाया गया है। इसकी बाहरी दृश्य170 फीट रखी गई है और आंतरिक भाग में भीतर की ओर 64 छोटे कक्ष बनाए गए हैं।

चौसठ योगिनी का मंदिर को देखने आने वाले जिज्ञासु आगंतुकों द्वारा मंदिर की तुलना भारतीय संसद भवन से की गई है। बहुत से लोगों ने यह निष्कर्ष निकाला है, कि भारतीय संसद भवन के निर्माण के पीछे इसी मंदिर से प्रेरणा ली गई है।

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मुरैना जिले में बहने वाली नदियां

Morena Jila गंगा नदी प्रणाली के अंतर्गत जल निकासी क्षेत्र का हिस्‍सा है। जिले में बरसात का पानी चंबल नदी से होकर बाहर निकल जाता है। यह नदी पश्चिम से उत्तर की ओर बहते हुए यमुना में मिल जाती है। चंबल नदी के अलावा जिले में आसन, कुँवरी, दक्षिण या सांक, सोले तथा सोन नदियॉं बहती हैं।

चंबल नदी | Chambal Nadi

मुरैना जिला की Chambal Nadi चंबल नदी
Chambal Nadi

चंबल नदी जिले इंदौर जिले की जनपओ पहाड़ियों (854 मीटर) से निकलकर पश्चिम से उत्तर दिशा की ओर बहती है। चंबल नदी इंदौर, उज्जैन, रतलाम तथा मंदसौर से होते हुए राजस्थान में प्रवेश करती है। पार्वती नदी का संगम श्‍योपुर जिले में होता है।

जहां यह श्योपुर जिले को छूते हुए जिले की पूर्वी सीमा का निमार्ण करती है। आगे चलकर यह नदी मुरैना जिले के उत्तर की ओर नितनवास में प्रवेश करते हुए मध्य प्रदेश तथा राजस्थान राज्‍य के मध्‍य एक प्राकृतिक अंतर-राज्यीय सीमा का निमार्ण करते हुए आगे बड़ती है।

उत्तर प्रदेश की सीमा में प्रवेश करते ही चंबल नदी इटावा जिले में यमुना नदी से जाकर मिल जाती है। चंबल नदी अपने प्रवाह के कारण नदी के किनारे काफी बडे क्षेत्र में दोनों ओर गहरी घाटियों का निमार्ण करते हुए चलती है।

इन गहरी घाटियों को ही चंबल के बीहड़ (चंबल बीहड़) के नाम से पहचाना जाता है। यही बिहड आगे चलकर डकैतों की शरण स्‍थली कहलायी। चंबल Morena Jila की प्रमुख नदी है। इसकी सहायक नदियों के अंतर्गत आसन तथा कुँवरी नदियाँ हैं। जिले के तहत बहने वाली चंबंल नदी के किनारे डॉल्फिनों के संरक्षण हेतु चंबल घडियाल परियोना चलाई जा रही है।

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Aashan Nadi | आसन नदी

आसन नदी का उदगम श्योपुर जिले के विजयपुर तहसील में स्थित देवरी के पठार से हुआ है।  यह Morena Jila से लगभग 24 कि.मी. उत्तर-पूर्व की ओर बहती है। इस नदी पर पगरा और कुटवार में दो बांधों का निर्माण किया गया है। आसन नदी द्वारा कुछ दूरी तक भिंड जिले की सीमा का निमार्ण किया जाता है।

यह नदी भिंड जिले के उत्तर दिशा की ओर बहती है। आसन नदी की प्रमुख सहायक नदी के तहत कुंवारी नदी का नाम आता है। कुंवारी नदी, आसन नदी में सांगोली गांव के पास आकर मिल जाती है। Morena Jila के दाहिने किनारे पर एकमात्र सहायक नदी दक्षिण या शंक है, जो कांवर बांध के उत्तर-पूर्वी किनारे पर आसन नदी में मिल जाती है।

Kunwari Nadi | कुंवारी नदी

कुंवारी नदी का उदगम शिवपुरी जिले के देवगढ़ में स्थित उत्तर-पूर्वी पठार में स्थित है। यहॉं से यह नदी श्योपुर जिले की सबलगढ़ तहसील में प्रवेश करती है। कुंवारी नदी श्‍योपुर जिले के मध्य से उत्तर पूर्व दिशा की ओर बहती है। यह नदी श्‍योपुर से आगे बहते हुए जौरा,  मुरैना और अम्बाह तहसील तक बहकर जाती है। यहां पहुंचकर यह नदी आसन नदी में मिल जाती है।

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Zila Panchayat Morena में अभ्‍यारण

मुरैना जिला के अंतर्गत मुख्‍य रूप से दो अभ्‍यारण्‍य मौजूद हैं- पालपुर-कुनो वन्यजीव अभयारण्य तथा राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभ्यारण।

Koono-Palapur Abhyaran | कूनो-पालपुर अभयारण्य

Morena Jila के अंतर्गत पालपुर-कुनो वन्यजीव अभयारण्य संचालित है। इस अभ्‍यारण को कुनो वन्यजीव अभयारण्य अथवा कुनो-पालपुर अभ्‍यारण के नाम से भी जाना जाता है। यह अभ्‍यारण उत्तर पश्चिमी मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में स्थित है। ग्वालियर जिले से इस अभ्‍यारण की लगभग दूरी 200 किमी (120 मील) है। कूनो पालपुर अभयारण्य कथियावार-गिर, सूखी पर्णपाती वन का हिस्सा है। इस अभ्‍यारण्‍य का कुल क्षेत्रफल 344.680 वर्ग किलोमीटर है।

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Rashtriy Chambal Ghadiyal Abhyaran | राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभ्यारण

मध्‍य प्रदेश राज्‍य के Morena Jila के अंतर्गत राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभ्यारण आता है। यह अभ्‍यारण्‍य 320 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के दायरे में फैला हुआ है। इस अभ्‍यारण्‍य में मुख्‍य रूप से घड़ियालों का संरंक्षण किया जाता है।

Morena Jila ke दर्शनीय स्‍थल

यहां के नूराबाद में गोना बेगम का मकबरा स्थित है। जिले के पहाड़गढ़ क्षेत्र के अंतर्गत प्रागैतिहासिक काल की 46 गुफाएं मौजूद है। जिले के अंतर्गत मौजूद नूराबाद नगर जहांगीर के शासन काल का नगर है। जिले में बहने वाली आसन नदी के तट पर उपलब्ध गुफाओं के तहत सबसे प्रसिद्ध तथा दर्शनीय गुफा लिखिराज है।

मुरैना जिले के अंतर्गत प्रमुख दर्शनीय व धार्मिक स्थलों के अंतर्गत ककनमठ मंदिर, सुहानियां जैन तीर्थ स्‍थल, कुतवार में हरसिद्धि देवी मंदिर, विष्णु मंदिर, योगिनी मंदिर, सबलगढ़ का किला, पहाड़गढ़ गुफा के शैल चित्र, शेरशाह सूरी का पुल, पदावली मंदिर तथा नूराबाद आदि स्थल आते हैं।

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Interesting Facts of Zila Panchayat Morena

  • यह जिला शहद उत्पादन के मामले में देश में प्रथम स्थान पर है।
  • मुरैना जिला देशभर में गजक के लिए मशहूर है।
  • इसी जिले के अंतर्गत प्रदेश में सर्वाधिक सरसों का उत्पादन किया जाता है।
  • जिले के अंतर्गत कैलारस में चीनी मिल संचालित है, इसके अलावा जिले का प्रमुख औद्योगिक केंद्र बानमोर है।
  • जिले के अंतर्गत चंबल नदी पर चंबल घड़ियाल अभ्यारण संचालित किया गया है, जिसके तहत घड़ियाल तथा डॉल्फिन का संरक्षण किया जा रहा है।
  • मुरैना जिले के अंतर्गत संत नागाजी के मेले का आयोजन किया जाता है।
  • जिले में देश के शहीद रामप्रसाद बिस्मिल की याद में बनाया गया मंदिर देश का पहला शहीद मंदिर कहलाता है।
  • मुरैना शहर 11वीं शताब्दी के दौरान कछवाहा वंश की राजधानी हुआ करता था।
  • कछवाहा वंश के राजा कीर्ति राज द्वारा ककनमठ नामक शिव मंदिर का निर्माण सिहोनिया नामक स्‍थान में कराया गया था।
  • ककनमठ शिव मंदिर का निर्माण रानी ककनवती के नाम पर किया गया है।
  • जिले की सबलगढ़ तहसील के अंतर्गत निर्मित सबलगढ़ किले का निर्माण गुर्जर सरदार सबला द्वारा करवाया गया था।
  • इस जिले के अंतर्गत चंबल, कुंवारी, आसन, सीप तथा सांक आदि प्रमुख नदियां प्रवाहित होती है।
  • जिले के तहत बहने वाली चंबंल नदी के किनारे डॉल्फिनों के संरक्षण हेतु चंबल घडियाल परियोना चलाई जा रही है।
  • जिले के तहत जनसंख्‍या घनत्‍व 394 पाया गया है।
  • यहॉं जिले के तहत शनिचरा मंदिर तथा दूबकुंड काफी प्रसिद्ध हैं।
  • मुरैना जिले का प्रमुख औद्योगिक विकास केन्‍द्र बानमौर में स्थित है।
  • जिले में ही पदावली तथा मितावली नामक स्‍थान गुप्‍तकालीन हैं।
  • जिले के तहत आने वाले बटेश्‍वर में प्राचीन मंदिर स्थित हैं, जिनका निमार्ण 6वीं से 7वीं शताब्‍दी के दौरान किया गया है।

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