Jammu Kashmir Parisiman

Jammu Kashmir Parisiman- कश्‍मीर समस्‍या का गुनहगार कौन हैं

पिछले 72 सालों में पहली बार केंद्र सरकार द्वारा Jammu Kashmir Parisiman लागू करने पर विचार किया है। आइए जानते हैं, राज्य में परिसीमन की कया स्थिति है मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार वर्तमान केन्‍द्र सरकार जम्‍मू एवं कश्‍मीर राज्‍य में जल्‍द ही परिसीमन लागू करने का निर्णय ले सकती है। इसके अंतर्गत जम्मू, कश्मीर तथा लद्दाख  आदि क्षेत्रों में विधानसभा सीटों में बदलाव होने की पूरी संभावना व्यक्त की जा रही है। इसके परिणाम स्वरूप जम्मू, कश्मीर तथा लद्दाख आदि क्षेत्रों के विधानसभा का नक्शा पूरी तरह से बदल जाएगा।

यदि हम आज तक का इतिहास देखें तो पाऐंगे, कि जम्मू कश्मीर की राजनीति में  कश्मीर क्षेत्र का पलड़ा ही हमेशा से भारी रहा है। जम्मू कश्मीर विधानसभा में कश्मीर क्षेत्र के तहत विधानसभा सीटें ही सबसे अधिक हैं। यदि यहॉं पर परिसीमन लागू किया जाता है, तो कश्मीर के मुकाबले जम्मू तथा लद्दाख क्षेत्र की विधानसभा सीटें बढ़ जाएंगी। Jammu Kashmir Parisiman परिणाम स्वरूप जो अलगाववादी नेता कश्मीर में अपनी राजनीति चमका रहे हैं, उनको काफी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा तथा इसके अलावा अलगाववादियों की कमर टूट जाएगी।

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Jammu Kashmir Parisiman Kya Hai

परिसीमन(Jammu Kashmir Parisiman) का अर्थ है, किसी राज्य के निर्वाचन क्षेत्र की सीमा का निर्धारण  करने की प्रक्रिया। हम यह भी कह सकतते हैं, कि किसी बार्डर को फिर से खींचना ही परिसीमन है। परिसीमन का कार्य घरेलू स्‍तर पर, राष्‍ट्रीय स्‍तर पर अथवा अर्न्‍तराष्‍ट्रीय स्‍तर पर किया जा सकता है। परन्‍तु इसे ज्‍यादातर चुनावी क्षेत्रों के निर्धारण के संबंध में ही देखा जाता है।

परंतु यह एक विडम्‍बना है, कि प्राय: सरकारें अपनी सुविधा के अनुसार ही परसीमन लागू करती आई हैं। भारतीय संविधान के आर्टिकल 82 में उल्‍लेख किया गया है, कि प्रत्‍येक 10 के अन्‍तराल के बाद सरकार को एक परिसीमन आयोग का गठन करना होगा।

Jammu Kashmir Parisiman Kya Hai
By StudyIQ(Prashant Dawan): Jammu Kashmir Parisiman

जिसकी अध्‍यक्षता सुप्रीमकार्ट का रिटायर्ड जज करता है। जिसका मुख्‍य कार्य देश में विधान सभा अथवा लोकसभा हेतु चुनाव क्षेत्रों का निर्धाण करना है। जिसका मुख्‍य उद्देश्‍य किसी क्षेत्र या जनसंख्‍या को लोकसभा अथवा विधानसभा क्षेत्रों में बराबर रूप से विभाजित किया जाना है। यह अध्‍यक्ष के विवेक पर निर्भर करता है।

देश के परिशीमन आयोग द्वारा एक बार निर्णय कर लिया गया, कि किसी क्षेत्र विशेष में इतनी लोकसभा या विधान सभा सीट होंगी, तो वह फाइनल होगा। इस फैसले को कोई भी राज्‍य या सरकार मानने से इन्‍कार नहीं कर सकती है तथा आयोग का फैसला अंतिम होता है, जिसके विरूद्ध सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई नहीं की जा सकती है।   

इससे पूर्रव पूरे देश में परिसीमन 2008 में लागू किया जा चुका है। परन्‍तु केवल जम्‍मू एवं कश्‍मीर राज्‍य में ही वर्ष 1993 से परिसीमन(Jammu Kashmir Parisiman) लागू नहीं किया जा सका है। गृह मंत्रालय से रिपोर्ट में कहा गया है, कि सरकार अभी जम्‍मू एवं कश्‍मीर राज्‍य में परिसीमन लागू नहीं करने जा रही है।

जम्‍मू कश्‍मीर राज्‍य में वर्ष 1993 के बाद परिसीमन लागू नहीं किया गया है। जबकि इसका निर्धारण वर्ष 2003 अथवा 2005 के आस-पास किया जाना था, परन्‍तु तात्‍कालीन जम्‍मू कश्‍मीर सरकार द्वारा वर्ष 2002 में एक एक्‍ट पास किया गया। इस एक्‍ट के मुताबिक जम्‍मू कश्‍मीर में वर्ष 2026 तक परिसीमन लागू नहीं किया जा सकेगा। इसके अलावा इसमें यह भी कहा गया, कि कश्‍मीर क्षेत्र में जो सीटों का बटवारा है, वह वही बना रहेगा।

जम्मू एवं कश्मीर विधानसभा में कुल 87 सीटों पर चुनाव आयोजित किया जाता है। जिसमें से केवल कश्मीर क्षेत्र के अंतर्गत 46 विधानसभा सीटें आती हैं। इनमें से जम्मू क्षेत्र के अंतर्गत 37 विधानसभा सीटें तथा लद्दाख क्षेत्र के अंतर्गत केवल 4 विधानसभा सीटें मौजूद हैं।

वर्ष 2002 के विधानसभा चुनावों के दौरान जम्मू एवं कश्मीर दोनों विधानसभा क्षेत्रों  में मात्र 2 लाख मतदाताओं का अंतर शेष था। इस दौरान जम्मू में 31 लाख रजिस्टर्ड वोटर दर्ज किए गए थे। इसके अलावा कश्मीर तथा लद्दाख क्षेत्र को मिलाकर 29 लाख वोटर पाए गए  थे। 

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Kashmir क्षेत्र में सर्वाधिक विधानसभा सीट होने का कारण

इस परिस्थिति को समझने के लिए यदि हम इतिहास में झांके तो हम पाते हैं, कि वर्ष 1947 के दौरान जम्मू एवं कश्मीर रियासत का विलय भारत में किया गया था। इस समय जम्मू एवं कश्मीर में महाराजा  हरिसिंह का शासन हुआ करता था। वर्ष 1947 तक कश्मीरियों के सर्वमान्य नेता शेख अब्दुल्लाह बन चुके थे।

जम्मू कश्मीर के महाराजा हरीसिंह द्वारा शेख अब्दुल्ला को पसंद नहीं किए जाने के बावजूद पंडित जवाहरलाल नेहरू के करीबी होने के कारण उन्हें वर्ष 1948 में जम्मू कश्मीर राज्य का प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। शेख अब्दुल्ला का जम्मू कश्मीर के प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त होने के बाद महाराजा हरिसिंह की सभी शक्तियां धीरे-धीरे क्षीण हाकर समाप्‍त हो गईं।

इसके परिणाम स्वरूप इस राज्य में शेख अब्दुल्लाह ,द्वारा अपनी मनमानी शुरू कर दी गईं। वर्ष 1951 में जम्मू कश्मीर के विधानसभा के गठन की प्रक्रिया के शुरुआती दौर में शेख अब्दुल्ला द्वारा जम्मू क्षेत्र को केवल 30 विधानसभा सीटें प्रदान की गईं। जबकि, कश्मीर क्षेत्र को 43 विधानसभा सीटें दी गईं। इसके अलावा उनके द्वारा लद्दाख को केवल दो ही विधानसभा सीटें प्रदान की गईं।

इन सीटों के बटवारे पर यदि हम गौर करें, तो पाऐंगे कि कश्मीर तथा लद्दाख क्षेत्र के साथ विधानसभा सीटों के बटवारे पर वहॉं शासन करने वाली सरकारों द्वारा भेदभाव किया गया। क्षेत्रफल के आधार पर देखने से पत चलता है, कि कश्मीर का क्षेत्रफल बाकी दोनों क्षेत्रों से कम होने के बावजूद वहॉं विधानसभा सीटों की संख्या जम्मू तथा लद्दाख से कहीं अधिक हैं।

वर्ष 1995 तक जम्मू कश्मीर राज्य में कुल विधानसभा सीटों की संख्या 75 हुआ करती थी। वर्ष 1993 के दौरान Jammu Kashmir Parisiman के लिए एक आयोग का गठन किया गया। इसके बाद वर्ष 1995 में इस परिसीमन आयोग की रिपोर्ट को लागू किया गया। परंतु राज्य में परिसीमन आयोग की अनुशंसाओं के लागू होने के पश्चात राज्य विधानसभा में 12 सीटें की अतिरिक्‍त वृद्धि की गई।

इस प्रकार जम्मू कश्मीर राज्य में कुल 87 विधानसभा सीटें हो गईं। नए Jammu Kashmir Parisiman लागू होने के पश्‍चात कश्मीर क्षेत्र में कुल 46 जम्मू क्षेत्र में 37 तथा लद्दाख क्षेत्र में कुल 4 विधानसभा सीटें हो गईं। यह स्थिति आज वर्तमान तक लागू है।

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Kashmir घाटी Ka जम्‍मू कश्‍मीर की राजनीति पर कब्‍जा

अभी वर्तमान में कश्मीर घाटी क्षेत्र में जम्मू तथा लद्दाख क्षेत्र से कहीं अधिक सीटें मौजूद हैं, जो 72 वर्ष होने के बाद भी जस की तस हैं। इसके अलावा किसी भी सरकार द्वारा जम्मू तथा लद्दाख क्षेत्र के साथ हुए इस अन्याय को किसी ने समाप्त करने की किसी ने कोशिश भी नहीं की।

यही वह इकलौती वजह है, जिसके कारण जम्मू-कश्मीर राज्य(Jammu Kashmir Parisiman) विधानसभा में क्षेत्र के दो महत्वपूर्ण परिवारों द्वारा संचालित PDP तथा National Conference जैसी पार्टियों का वर्चस्व रहा है। यह दोनों पार्टियां कश्मीर केंद्रित हैं। यदि हम जम्मू कश्मीर राज्य की राजनीति का विश्लेषण करें तो पाते हैं, कि पूरी विधानसभा में कश्मीर क्षेत्र से चुने हुए विधायकों का ही दबदबा रहता है।

Kashmir घाटी Ka जम्‍मू कश्‍मीर की राजनीति पर कब्‍जा

बिना कश्‍मीर क्षेत्र के विधायकों को साथ लिए जम्‍मू तथा कश्‍मीर राज्‍य में कोई भी सरकार नहीं बन सकती है। इसके पीछे का एक कारण यह भी है, कि जम्मू तथा लद्दाख की 37 व 4 सीटों को जोड़ने पर इनकी कुल संख्या 41 ही होती है।

जो कश्मीर क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली विधानसभा सीटों से 5 कम हैं। इसका परिणाम यह होता है कि जम्मू कश्मीर विधानसभा का मुख्यमंत्री हमेशा कश्मीर घाटी से ही चुनकर आता है। जम्मू कश्मीर राज्य में किसी भी पार्टी को बहुमत साबित करने के लिए कुल 44 सीटों की ही आवश्यकता पड़ती है, जो इन दोनों परिवारों के द्वारा संचालित पार्टियों से आसानी से प्राप्त कर ली जाती है।

कश्मीर घाटी में मुसलमानों की आबादी कुल 98% है। इसका परिणाम स्‍वरूप बहुत ही आसानी से बहुमत हेतु जरूरी 44 सीटें यहॉं से आसानी से प्राप्त कर ली जाती हैं। कश्मीर केंद्रित राजनीति होने के कारण जम्मू तथा लद्दाख क्षेत्र के साथ हमेशा ही सौतेला व्यवहार होता आया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूसरी पाली की सरकार के गठन के पश्चात जम्मू कश्मीर राज्य की असली समस्या  की जड़ को समझते हुए केन्‍द्र Jammu Kashmir Parisiman लागू करने की तैयारी में है।

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राज्‍य में कश्‍मीर प्रशासकों द्वारा जम्मू कश्मीर में परिसीमन को रोकना

Jammu Kashmir Parisiman नए सिरे से लागू करने में सर्वाधिक समस्याएं फारूक अब्दुल्लाह ने ही पैदा की थीं। उनको पता था, कि Jammu Kashmir Parisiman लागू होते ही सत्ता की चाबी उनके हाथ से निकल जाएगी तथा लद्दाख एवं जम्मू क्षेत्र के लोगों को अधिक शक्तियां प्राप्त हो  जाएंगी।

वर्ष 2002 में नेशनल कान्फ्रेंस की सरकार द्वारा राज्य में परिसीमन को 2026 तक रोक दिया गया था। इसके लिए नेशनल कांफ्रेंस सरकार द्वारा Jammu and Kashmir Representation of the People Act 1957 तथा जम्मू कश्मीर के संविधान के सेक्शन 47(3) में बदलाव किया गया था।

जम्मू कश्मीर संविधान के सेक्शन 47(3) के अनुसार यह निर्देशित किया गया, कि वर्ष 2026 के बाद जब तक जनसंख्या के सही आंकड़े सामने नहीं आते हैं, तब तक राज्य की विधानसभा की सीटों में बदलाव करना जरूरी नहीं होगा। इसी आधार पर हम पाते हैं, कि वर्ष 2026 के बाद अगली जनगणना के आंकड़े वर्ष 2031 में प्राप्त होंगे। जिसके हिसाब से Jammu Kashmir Parisiman वर्ष 2031 तक टल जाएगा।

इसके पीछे की मुख्‍य वजह वर्ष 2026 के बाद राज्‍य में अगली जनगणना 2031 में की जाएगी। इस प्रकार से वर्ष 2031 तक अब्दुल्ला सरकार या मुफ्ती मोहम्मद सईद की पार्टियों द्वारा जम्मू कश्मीर राज्य में विधानसभा चुनाव जीतकर अपना शासन बेरोक-टोक जारी रखा जाएगा।

फारूक अब्दुल्ला सरकार के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने भी एक याचिका दायर की गई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2010 में खारिज कर दिया गया था। इसके अलावा तात्‍कालीन केन्‍द्र सरकार द्वारा भी इस पर कोई आपत्ति नहीं दर्ज कर अपनी मौन स्‍वीकृति प्रदान की गई थी।

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Kashmir Samasya ke Gunahgar | कश्‍मीर समस्‍या के गुनहगार

एक तरह से देखा जाए तो कश्मीर समस्या के लिए अब्दुल्ला परिवार ही सबसे ज्यादा जिम्मेदार है, क्योंकि अब्दुल्ला परिवार, पंडित जवाहरलाल नेहरू के सबसे करीब रहा तथा कश्मीर भी हमेशा नेहरू जी के करीब रहा।

जिसकी वजह से गांधी परिवार द्वारा कश्मीर पर कभी विशेष ध्यान नहीं दिया गया और यहां पर पनप रही राजनीति के रास्ते में कभी भी अड़ंगा नहीं लगाया गया। जिसका परिणाम यह हुआ कि यहां जिस किसी पार्टी ने भी सत्ता हासिल की उसके द्वारा मनमानियां जारी रखी गईं।

पंडित जवाहरलाल नेहरु की कुछ गलतियों के कारण कश्मीर में  शेख अब्दुल्ला का कद लगातार बढ़ता रहा। वर्ष 1948 में शेख अब्दुल्ला को कश्मीर का प्रधानमंत्री बनाया गया। शुरुआती दौर में तो शेख अब्दुल्ला द्वारा नेहरू जी का समर्थन किया गया, परन्‍तु जैसे-जैसे वक्त बदला शेख अब्दुल्ला को अपनी राजनीति के रास्‍ते में नहरूजी खटकने लगे।

इसके परिणाम स्‍वरूप वर्ष 1953 के बाद शेख अब्दुल्ला को कई आरोपों के आधार पर नहरू सकरकार द्वारा उन्‍हें उनके पद से हटाकर गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। इसी घटना के पश्चात शेख अब्दुल्ला द्वारा भारत का खुलकर विरोध किया जाने लगा। वर्ष 1964 में पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा शेख अब्दुल्ला को 11 वर्षों के बाद रिहा कर दिया गया।

यही इनकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई। परिणाम स्‍वरूप रिहाई के बाद बाहर आने के बाद शेख अबदुल्‍ला कश्मीर की जनता के हीरो बन कर उभरे। जेल में रहने के बाद उनके विचारों में भी काफी बदलाव आ गया था। 26 फरवरी 1975 को शेख मोहम्मद अब्दुल्ला द्वारा जम्मू कश्मीर राज्य के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली गई।

इसके पश्चात उनके बेटे फारूक अब्दुल्लाह तथा उनकी तीसरी पीढ़ी उमर अबदुल्‍ला भी जम्मू कश्मीर राज्य के मुख्यमंत्री बने। जम्मू कश्मीर राज्य पर एक लंबे वक्त तक अब्दुल्ला परिवार का शासन रहा है।

अपनी राजनीति चमकाने के लिए अब्दुल्ला परिवार द्वारा कश्मीर के लोगों की भावनाओं को भड़काया जाता रहा है। जिसके परिणाम स्वरूप वहां जन भावना भड़कती रहीं। लेकिन  दिल्ली में इस परिवार के लोगों की भूमिका समय के हिसाब से बदलती रही है।

 इसे देखते हुए नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा प्रत्येक स्तर पर कोशिश तेज कर दी गई हैं। उनके द्वारा अलगाववादियों पर अलग से नकेल कसी जा रही है, तो राजनीतिक स्तर पर Jammu Kashmir Parisiman लागू किये जाने की तैयारी है।

यदि हम जम्मू कश्मीर राज्य के नक्शे को देखें तो पाऐंगे, कि जम्मू कश्मीर राज्य के नक्शे में सबसे बड़ा भूभाग लद्दाख का है, जो 61% है। इस क्षेत्र में आतंकवाद का कहीं भी नामो-निशान नहीं है। इसके बाद जम्मू का नंबर आता है, जो क्षेत्रफल की दृष्टि से  22 प्रतिशत है।

यहॉं से आतंकवाद को समाप्त हुए काफी लंबा समय बीत चुका है। कश्मीर घाटी का क्षेत्रफल  केवल 16% है, जो पूर्ण रूप से आतंकवाद से ग्रसित है। इसी कश्मीर घाटी से पूरे राज्य की राजनीति संचालित की जाती है। जबकि, क्षेत्रफल की दृष्टि से भी यह सबसे छोटा इलाका है।

जम्मू तथा लद्दाख के क्षेत्रफल को मिलाकर कश्‍मीर के क्षेत्रफल की तुलना करने पर कश्‍मीर का क्षेत्रफल दोनों के क्षेत्रफल का आधा भी नहीं है। लेकिन इसके बावजूद विधानसभा की कुल सीटों की तुलना में कश्मीर के हिस्‍से में जम्‍मू तथा लद्दाख की सीटों को मिलाकर आने वाले आंकडे से भी 5 अधिक हैं।

यही वह वजह है, जो संदेह की स्थिति पैदा करती है। छोटा क्षेत्रफल होने के बावजूद भी कश्मीर में विधानसभा की इतनी सीटें क्यों मौजूद है ? शेष दोनों क्षेत्रों के साथ अन्याय क्यों किया जा रहा है ? यही सोचने वाले सवाल हैं। कश्मीर क्षेत्र के अंतर्गत 10 जिले आते हैं, जिनमें से सर्वाधिक 4 जिले ही आतंकवाद से ग्रसित हैं।

आतंकवाद से ग्रसित जिलों के अंतर्गत दक्षिण कश्मीर के पुलवामा, शोपिया, अनंतनाग तथा कुलग्राम ही आते हैं, जिन्‍हें आतंकवाद का गढ़ माना जाता है। केवल इन्हीं जिलों में आतंकवादी घटनाएं घटती हैं। लेकिन आपके सामने यह बताने का प्रयास किया जाता है, कि पूरा की पूरा जम्मू कश्मीर ही आतंकवाद से ग्रसित है तथा यहॉं के हालत बहुत ही खराब हैं।

भारत में आखिरी बार परिसीमन 2008 में आंध्रप्रदेश राज्य में किया गया था। वर्तमान में जम्मू-कश्मीर राज्य में 19 दिसंबर 2018 से राष्ट्रपति शासन लागू है तथा चुनाव आयोग के अनुसार इस वर्ष के आखिर में वहां विधानसभा चुनाव की कराए जाने की संभावना है।

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Jammu Kashmir Parisiman की आवश्‍यकता क्‍यों?

यदि हम गौर करें तो पाते हैं, कि कश्‍मीर क्षेत्र में प्रति विधान सभा क्षेत्र के औसत मतदाता जम्‍मू क्षेत्र के प्रति विधान सभा क्षेत्र के औसत मतदाताओं से काफी कम होने के बावजूद भी कश्‍मीर क्षेत्र से सर्वाधिक विधानसभा सीटें आती हैं।

परिणाम यह होता है, कि जनसंख्‍या के हिसाब से क्षेत्र विशेष की जनसंख्‍या का प्रतिनिधि चुनकर नहीं आ पाता है। इस हिसाब से देखा जाए तो जम्‍मू तथा लद्दाख क्षेत्र की जनसंख्‍या को अपनी संख्‍या के आधार पर अपना प्रतिनिधित्‍व चुनने का अधिकार नहीं मिला है।

कश्‍मीर के पास पूरे राज्‍य का कुल 15.8% क्षेत्रफल है। इसके अलावा कश्‍मीर में कुल जनसंख्‍या का 54.9% भाग है। वहीं दूसरी ओर जम्‍मू क्षेत्र पूरे राज्‍य का 25.9% भू-भाग है। यहॉं राज्‍य की कुल जनसंख्‍या का 42.9% हिस्‍सा है।

यदि लद्दाख की बात करें तो पाते हैं, कि यहॉं पूरे राज्‍य का 58.3% भू-भाग के अलावा राज्‍य की कुल जनसंख्‍या का 2.2% हिस्‍सा मौजूद है। (सेन्‍सस 2011 के आंकड़ों के आधार पर) 

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